Indian Railways Train Accident Investigation Policy में एक ऐसा ऐतिहासिक बदलाव किया गया है जो रेल यात्रा के इतिहास को हमेशा के लिए सुरक्षित बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम साबित हो सकता है। रेलवे बोर्ड के इस चौंकाने वाले फैसले ने पुराने ढर्रे को पूरी तरह हिला कर रख दिया है। अब किसी भी हादसे के बाद जांच कमेटियां केवल औपचारिकता पूरी नहीं कर पाएंगी।
कर्मचारियों पर दोष मढ़ने का खेल खत्म रेलवे में पहले जब भी कोई बड़ा कंसीक्वेशल ट्रेन एक्सीडेंट होता था, तो सारा ध्यान सिर्फ इस बात पर रहता था कि गाज किस पर गिराई जाए। किसी एक छोटे या बड़े रेल कर्मचारी पर जिम्मेदारी डाल दी जाती थी, उस पर कठोर विभागीय कार्रवाई होती थी और मामले की फाइल को हमेशा के लिए बंद मान लिया जाता था। लेकिन अब सिस्टम के पीछे छिपे असली सच को सामने लाना अनिवार्य होगा।
सिर्फ सजा नहीं, असली वजह जानना जरूरी Indian Railways Train Accident Investigation Policy के तहत रेलवे बोर्ड ने अब साफ निर्देश दिया है कि सिर्फ किसी को दोषी ठहराने से काम नहीं चलेगा। जांच टीमों को अब गहराई से यह बताना होगा कि ‘हादसा क्यों हुआ’। इसका मतलब है कि हादसे की असली वजह यानी रूट काज का पता लगाना अब हर हाल में जरूरी कर दिया गया है ताकि लापरवाही की जड़ को हमेशा के लिए उखाड़ा जा सके।
जीएम को मिले नए और कड़े आदेश रेलवे बोर्ड के पीईडी यानी प्रिंसिपल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर (सेफ्टी) उपिंदर सिंह ने देश के सभी जोनल रेलवे के महाप्रबंधकों (जीएम) को कड़े दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। नए नियमों के अनुसार, जांच कमेटी को अपनी मुख्य रिपोर्ट के साथ ‘पार्ट-बी’ यानी विस्तृत दुर्घटना अध्ययन एवं विश्लेषण रिपोर्ट को अनिवार्य रूप से जोड़ना होगा। इसमें तकनीकी और इंसानी चूक का पूरा पोस्टमार्टम किया जाएगा।
तकनीकी खामियों पर लगेगा फुल स्टॉप Indian Railways Train Accident Investigation Policy के नए प्रावधानों के तहत अब सिस्टम की हर छोटी से छोटी तकनीकी खामी, सिग्नलिंग की गड़बड़ी या ट्रैक मैनेजमेंट की चूक को ऑन-रिकॉर्ड लाया जाएगा। उपिंदर सिंह के अनुसार, प्रारंभिक विभागीय जांच को हमेशा की तरह सिर्फ 10 दिनों (डी 10) के भीतर पूरा करना होगा, जबकि ‘पार्ट-बी’ रिपोर्ट को अंतिम रूप देने और सक्षम अधिकारी से मंजूर कराने के लिए कुल 30 दिनों (डी 30) का समय मिलेगा।







