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Three Language Formula Row: कक्षा 9वीं में तीसरी भाषा अनिवार्य करने पर भड़कीं जस्टिस बीवी नागरत्ना, केंद्र को दी नसीहत

Three Language Formula Row ने देश की शिक्षा नीति और स्कूली पाठ्यक्रमों को लेकर एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) में स्कूली छात्रों पर पढ़ाई के बढ़ते बोझ और तनाव से जुड़ी एक बेहद संवेदनशील याचिका पर सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीशों ने तल्ख टिप्पणियां की हैं। सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने केंद्र सरकार की भाषा नीति और उसके क्रियान्वयन के तरीकों पर सीधे तौर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कक्षा 9वीं के बच्चों पर अतिरिक्त तनाव न डालें सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों को सीधे तौर पर आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि माध्यमिक स्तर (कक्षा 9वीं) पर आकर बच्चों के ऊपर अचानक किसी तीसरी भाषा को अनिवार्य रूप से थोपना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस उम्र में छात्र पहले से ही बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी, करियर के दबाव और कई कठिन विषयों के बोझ तले दबे होते हैं, ऐसे में उन पर एक और नई भाषा लादना सरासर अनुचित है।

भाषा चुनने की आज़ादी छात्रों पर छोड़नी होगी अदालत ने केंद्र को नसीहत देते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य छात्रों का मानसिक विकास करना होना चाहिए, न कि उन्हें किसी तनावपूर्ण दलदल में धकेलना। Three Language Formula Row के तहत नियमों को लचीला बनाने की वकालत करते हुए पीठ ने कहा कि किसी भी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध नई भाषा सीखने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। स्कूलों में यह पूरी तरह से वैकल्पिक होना चाहिए ताकि जो बच्चे रुचि रखते हैं, केवल वही इसका चयन करें, न कि हर बच्चे के लिए यह एक अनिवार्य सिरदर्द बने।

शिक्षा व्यवस्था में व्यावहारिक बदलावों की सख्त जरूरत जस्टिस नागरत्ना ने भारत के वर्तमान स्कूली ढांचे और प्रतियोगिता के माहौल का जिक्र करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आज के दौर में 9वीं और 10वीं कक्षा के छात्रों का शेड्यूलिंग पैटर्न और सिलेबस पहले से ही काफी जटिल है। ऐसे में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) या किसी भी अन्य त्रि-भाषा फार्मूले को लागू करते समय जमीनी हकीकत और बच्चों के मानसिक स्तर का व्यावहारिक मूल्यांकन करना केंद्र सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

देश भर के अभिभावकों और शिक्षकों में मची खलबली सुप्रीम कोर्ट की इस तल्ख टिप्पणी के बाद से देश भर के विभिन्न राज्यों के शिक्षा बोर्ड, निजी स्कूलों के संघों, शिक्षकों और खासकर अभिभावकों के बीच यह मामला चर्चा का मुख्य विषय बन गया है। अधिकांश अभिभावक संगठन अदालत के इस मानवीय दृष्टिकोण का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार को केवल कागजी नीतियां बनाने के बजाय इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि क्या हमारे बच्चे वास्तव में बिना किसी भारी मानसिक तनाव के उस पाठ्यक्रम को आत्मसात कर पा रहे हैं या नहीं।

क्या है त्रि-भाषा फार्मूले का पूरा कानूनी विवाद इस पूरे विवाद की जड़ दरअसल केंद्र की उस महत्वाकांक्षी योजना में है, जिसके तहत छात्रों को अपनी मातृभाषा और अंग्रेजी के अलावा एक तीसरी भारतीय भाषा (जैसे संस्कृत, तमिल, तेलुगु या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा) को माध्यमिक स्तर तक अनिवार्य रूप से पढ़ने का प्रस्ताव दिया गया है। Three Language Formula Row इसी अनिवार्यता के खिलाफ है, जहां शिक्षाविदों और कानूनी विशेषज्ञों का एक बड़ा धड़ा इसे छात्रों के मौलिक अधिकारों और उनके चयन की स्वतंत्रता पर एक सीधा प्रशासनिक दबाव मान रहा है।

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