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प्राविधिक शिक्षा विभाग ट्रांसफर विवाद: लखनऊ में मचा भारी बवाल

प्राविधिक शिक्षा विभाग ट्रांसफर विवाद ने लखनऊ के सरकारी गलियारों में एक ऐसा सनसनीखेज मोड़ ले लिया है जिसने पूरी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग में मेधा आधारित ऑनलाइन तबादलों की आड़ में पक्षपात और भारी हेरफेर का एक बड़ा मामला गरमाता जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया ने योग्य शिक्षकों और अधिकारियों को मानसिक रूप से परेशान कर दिया है।

स्पेशल टेक्निकल सेल पर गंभीर आरोप: इस पूरे मामले में विभाग के स्पेशल टेक्निकल सेल की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठ रही हैं। तकनीकी रूप से पूरी ट्रांसफर प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की जिम्मेदारी इसी सेल के कंधों पर थी। सूत्रों का दावा है कि धरातल पर काम करने के बजाय इस सेल के जिम्मेदार लोग केवल रसूखदार जगहों पर अटैचमेंट का मजा ले रहे हैं।

लापरवाही और गायब हुआ एसीआर डेटा: नियमों के मुताबिक ऑनलाइन ट्रांसफर की मेरिट बनाने के लिए अधिकारियों के पिछले तीन वर्षों के वार्षिक गोपनीय मूल्यांकन (ACR) का औसत निकालना जरूरी था। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि टेक्निकल सेल के पास कई कर्मचारियों का डेटा ही मौजूद नहीं था। इस आधे-अधूरे और त्रुटिपूर्ण डेटा के कारण सभी के साथ समानता का व्यवहार नहीं हो सका।

अवनींद्र का नाम और पैसे का लेन-देन: इस प्राविधिक शिक्षा विभाग ट्रांसफर विवाद के केंद्र में मुख्य भूमिका के रूप में अवनींद्र का नाम सामने आ रहा है। पीड़ित अधिकारियों का आरोप है कि अवनींद्र द्वारा फोन करके नाजायज वित्तीय मांगें की गईं। जिन अधिकारियों ने अनुचित मांगें पूरी करने से मना कर दिया, उनके नाम जानबूझकर मुख्य रिकॉर्ड और ट्रांसफर लिस्ट से गायब कर दिए गए।

योग्य अधिकारियों को किया गया दरकिनार: इस कथित भारी वित्तीय लेन-देन और पैसों के हेर-फेर के चलते कई बेहद योग्य और वरिष्ठ अधिकारियों को दरकिनार कर दिया गया। उनकी जगह चहेते और पसंदीदा लोगों को मनचाही पोस्टिंग सौंप दी गई। विभाग ने कई महत्वपूर्ण सर्विस रिकॉर्ड और आपत्तियों को अंडर कंसीडरेशन में रखकर जल्दबाजी में यह सूची जारी की है।

अधिकारियों का विरोध और निष्पक्ष जांच की मांग: इस प्राविधिक शिक्षा विभाग ट्रांसफर विवाद के बाद विभागीय संघों ने पुरजोर विरोध दर्ज कराया है। हालांकि विभाग ने आनन-फानन में कुछ शिकायतों को सुना, लेकिन वह केवल इक्का-दुक्का लोगों को राहत देने तक ही सीमित रहा। प्रभावित अधिकारी अब निदेशालय के संदिग्ध अफसरों और अवनींद्र की भूमिका की उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं।

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