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Up Technical Education Transfer Scam: प्राविधिक शिक्षा विभाग में तबादलों का बड़ा खेल, समय सीमा खत्म UP Transfer News

Up Technical Education Transfer Scam document and online portal layout desk

Up Technical Education Transfer Scam के इस बड़े खुलासे ने लखनऊ से लेकर पूरे उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में तहलका मचा दिया है। उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग में समूह ख क्लास 2 के अधिकारियों के स्थानांतरण को लेकर मचे घमासान ने विभाग की कार्यप्रणाली को एक बार फिर से कटघरे में खड़ा कर दिया है। शासन द्वारा स्थानांतरण की तय समय सीमा और उसके बाद बढ़ाई गई विस्तारित समय सीमा भी अब पूरी तरह समाप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है, लेकिन विभाग अभी भी सुस्त रफ्तार से ऑफिस ऑफिस खेल रहा है। विभाग के आला अधिकारियों को जरा भी परवाह नहीं है कि क्लास 2 के अधिकारी वर्तमान व्यवस्था और असमंजस की स्थिति के कारण कितने परेशान और कितनी बुरी मानसिक अवस्था में जी रहे हैं।

दबाव में गोलमाल की नीयत निदेशक ने प्रमुख सचिव को जो पत्र भेजा है, उसके सार्वजनिक होने के बाद यह पूरी तरह साफ हो गया है कि विभाग पर भले ही शासन और चारों तरफ के दबाव के कारण स्थानांतरण प्रक्रिया को पारदर्शी एवं निष्पक्ष दिखाने का दबाव है, लेकिन अंदरूनी नियत अभी भी पूरी तरह गोलमाल करने की ही बनी हुई है। चर्चाओं और सूत्रों की मानें तो विभाग इस Up Technical Education Transfer Scam की प्रक्रिया में ठीक वैसा ही खेल करने की फिराक में है जैसा उन्होंने क्लास 1 aur क्लास 3 के स्थानांतरणों में किया है, जहां खुलेआम समस्त नियमों की धज्जियां उड़ाई गई थीं और जमकर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।

नियमों को मरोड़ने की साजिश इन सरकारी पत्रों के मजमून और उठ रहे सवालों को देखकर अब ऐसा ही प्रतीत होता है कि शासन ने स्थानांतरण के लिए जो पारदर्शी और कड़े नीतिगत निर्देश निर्धारित किए हैं, विभाग उसमें अपनी सुविधा के अनुसार तोड़ मरोड़ कर रहा है। वह केवल चुनिंदा बिंदुओं को ही आधार बना रहा है, जिससे मनमाने तरीके से अवैध वसूली करके अपने चहेतों का मनमुताबिक स्थानांतरण किया जा सके। पत्र की बारीकियों से यह भी स्पष्ट होता है कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे विभाग लगातार उन रसूखदार अधिकारियों को बचा रहा है जो अवैध रूप से अपना संबद्धीकरण महानगरों एवं मलाईदार पोस्टों पर करवाकर एक लंबा समय व्यतीत कर चुके हैं। विभागीय गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि ऐसे चहेते अफसरों को फिर से मनचाही तैनाती देकर उनके पुराने पापों को ढकने की पूरी तैयारी कर ली गई है।

रसूखदारों की मलाईदार तैनाती इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि जिन रसूखदार अधिकारियों ने अपनी मूल संस्थानों में कभी काम ही नहीं किया और लंबे समय तक मलाईदार संबद्धीकरण का मजा लेते हुए पूरा वक्त बिता दिया, उनकी तैनाती मूल रूप से कहां मानी जाएगी? कागजों पर तो ये अधिकारी किसी दूर दराज या ग्रामीण क्षेत्रों की संस्था में तैनात दिखाए गए हैं, लेकिन असलियत यह है कि वे बड़े शहरों में बैठकर मजे मार रहे हैं, कथित रूप से अवैध वसूली में लिप्त हैं और धरातल पर पढ़ाई लिखाई के काम से कोसों दूर हैं। इसके अलावा विभाग ने कई ऐसे पेचीदा नियम खड़े कर दिए हैं जिससे सीधे और कमजोर अधिकारियों का केवल शोषण हो और रसूखदारों को फिर से ऐश करने का पूरा मौका मिल जाए।

अवैध टेक्निकल सेल का सच इस बीच विभाग की कार्यक्षमता को लेकर एक बेहद मजेदार और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। विभाग में एक तथाकथित अवैध टेक्निकल सेल गठित है, जो माननीय के सजातीय करीबियों और रसूखदारों को आराम और अवैध वसूली का मौका प्रदान करती है। यह सेल पिछले दो सालों से एक अदद मेरिट बेस्ड ऑनलाइन प्लेटफार्म बनाने में भी पूरी तरह असफल साबित हुई है। सूत्रों से प्राप्त पुख्ता जानकारी के अनुसार, इस नाकामी को छुपाने के लिए विभाग ने प्रदेश भर से लगभग 50 कुशल अधिकारियों को काम पर बुलाया और उनकी मदद li। यह मदद अभी भी लगातार जारी है और इतने तामझाम के बाद जाकर उस ऑनलाइन प्लेटफार्म की केवल 50 प्रतिशत तैयारी ही पूरी हो पाई है।

करोड़ों के खर्च पर उठते सवाल अब विभाग के इस रवैए पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि अगर विभाग के ही काबिल व लायक अधिकारियों और बाहर के पेशेवरों की मदद से ही इस ऑनलाइन ट्रांसफर प्लेटफॉर्म को तैयार किया जाना था, तो फिर इस विशेष टेक्निकल सेल की उपयोगिता ही क्या है? जानकार बताते हैं कि यह सेल सिर्फ और सिर्फ अवैध वसूली और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई है। यदि अवैध रूप से संबद्ध अधिकारियों की सूची तैयार की जाए और उन पर होने वाले सरकारी व्यय का सही आकलन किया जाए, तो यह आंकड़ा करोड़ों रुपए में आएगा। इतने भारी खर्च की तुलना में बहुत ही कम पैसों में किसी भी प्रतिष्ठित निजी संस्था या पेशेवर तकनीकी संस्था से इस प्रकार का ऑनलाइन प्लेटफार्म बेहद कम समय और पूरी पारदर्शिता के साथ तैयार कराया जा सकता था। इससे यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि इस सेल में बैठे लोग केवल अपनी जेबें भरने में व्यस्त हैं।

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